इतिहास साक्षी है योद्धा मैं निपुण था || Suryaputra Karn Shayri Status || Karna Poetry Status



इतिहास साक्षी है योद्धा मैं निपुण था || Suryaputra Karn Shayri Status || Karna Poetry Status
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Poetry Details: Kahani Karn Ki (कहानी कर्ण की) इस कविता में महाभारत के महावीर महा दानवीर योद्धा मृत्युंजय कर्ण की अद्भुत शौर्य गाथा के बारे में बताया गया है इस कविता को अभी मुंडे जी द्वारा लिखा गया है और सचिन शुक्ला जी ने अपनेे स्वर से कर्ण पर आधारित इस अद्भुत कविता का सृजन किया है।
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कर्ण पर आधारित अन्य अद्भुुुत कविताएं :

कृष्ण कर्ण संवाद (रश्मिरथी) : https://youtu.be/ZE4zUhI08J0

कर्ण दुर्योधन की मित्रता पर कविता : https://youtu.be/W_DBbV_TwMw

पांडव मेरा परिवार नहीं(कर्ण कविता) : https://youtu.be/i0n-YsmxLyc

कर्ण की व्यथा : https://youtu.be/ahCrGM4WO9M

करता न शत्रु पर कर्ण दया : https://youtu.be/at-YqjFw57Y

अनेकों भांति से गोविंद मुझको छल रहे हैं (कर्ण कविता) : https://youtu.be/lZct0_pNPvA

सारे जग का दुख एक ही दानवीर ने पाया है : https://youtu.be/3orwqeeph_k

कर्ण भीष्म संवाद : https://youtu.be/3m1K_J-S-iU

रण में क्यों आये आज लोग मन-ही-मन में पछताते थे : https://youtu.be/zpM98X7ICxw
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Lyrics:

पांडवों को तुम रखो मैं कौरवों की भीड़ से,
तिलक शिकस्त के बीच में जो टूटे ना वो रीढ़ में।

आओ मैं बताऊं महाभारत के सारे पात्र ये,
भोले की सारी लीला थी किशन के हाथों सूत्र थे।

बलशाली बताया जिन्हें सारे राजपुत्र थे,
काबिल दिखाया बस लोगों को ऊंची गोत्र के।

सोने को पिघला के डाला शोन तेरे कंठ में,
नीची जाति होके किया वेद का पठन तूने।

यही था गुनाह तेरा तू सारथी का अंश था,
तो क्यों छिपे मेरे पीछे मैं भी उसी का वंश था।

ऊंच-नीच की जड़ अहंकारी द्रोण था,
वीरों की उसकी सूची में अर्जुन के सिवा कौन था।

मानव था जो माधव को वीर तो क्यों डरा एकलव्य से,
मांग के अंगूठा क्यों जताया पार्थ भव्य है।

रथ पर सजाया जिसने कृष्ण हनुमान को,
योद्धाओं के युद्ध में लड़ाया भगवान को।

नंदलाल तेरी ढाल पीछे अंजनीय थे,
नियति कठोर थी जो दोनों वंदनीय थे।

ऊंचे ऊंचे लोगों में मैं ठहरा छोटी जात का,
खुद से ही अनजान मैं ना घर का ना घाट का।

सोने सा था तन मेरा अभेद्य मेरा अंग था,
कर्ण का कुंडल चमका लाल नीले रंग का।

इतिहास साक्ष्य है योद्धा मैं निपुण था,
एक मजबूरी थी मैं वचनों का शौकीन था।

गर ना दिया होता वचन वो मैंने कुंती मात को,
तो पांडवों के खून से मैं धोता अपने हाथ को।

साम दाम दंड भेद सूत्र मेरे नाम का,
गंगा मां का लाडला मैं खामखां बदनाम था।

कौरवों से होके भी कोई कर्ण को ना भूलेगा,
जाना जिसने दुख मेरा वो कर्ण कर्ण बोलेगा।

भास्कर पिता मेरे हर किरण मेरा स्वर्ण है,
वन में अशोक मैं तू तो खाली पर्ण है।

कुरुक्षेत्र की उस मिट्टी में मेरा भी लहू जीर्ण है,
देख छान कर उस मिट्टी को कण कण में कर्ण है।

Music: bensound & Mahabharat Star Plus from Nojoto
Images: StarPlus Mahabharat

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