जयशंकर प्रसाद जी द्वारा रचित इस कविता में कवि की आकांक्षा है कि वह शोर शराबे और कोलाहल की दुनिया से दूर कहीं ऐसे स्थान में चला जाए जहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य और नीरवता हो।

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